महावीर जयंती त्याग के प्रतीक, अहिंसा ही धर्म

भगवान महावीर ने कहा- अहिंसा परमोधर्मा: यानी अहिंसा ही सबसे बड़ा धर्म है. संपूर्ण सृष्टि को इस सिद्धांत को अपनाने की जरूरत है. क्योंकि यहीं से संसार के कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है.

नई दिल्ली: जैन धर्म के सबसे खास त्योहारों में महावीर जयंती का खास महत्व है. भगवान महावीर का मूल नाम वर्धमान था. उनकी मां का नाम त्रिशला और पिता का नाम सिद्धार्थ था। कहते हैं कि वर्धमान की अद्भुत शक्तियों को देखते हुए ही उन्हें महावीर के नाम से पुकारा जाने लगा. महावीर की पत्नी का नाम यशोदा था. कहते हैं कि महावीर का मन सांसारिक जीवन में नहीं लगता था. वो तपस्या और मानव कल्याण ही करना चाहते थे. कहा जाता है कि उन्होंने करीब 30 साल की उम में घर छोड़ दिया था. महावीर ने दीक्षा धारण के बाद 12 साल तक कठोर तप किया. साल वृक्ष के नीचे उन्हें कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई. पावापुरी में उन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ था. महावीर अहिंसा के सिद्धांत को खुद भी मानते थे और अपने अनुयायिओं से भी इसका कठोर पालन करने को कहते थे.
महावीर जयंती जैन धर्मावलंबी त्याग, तपस्या और मानव कल्याण के प्रतीक भगवान महावीर के जन्मोत्सव मनाते हैं. दुनिया के हर उस देश में जहां जैन धर्म के लोग हैं, वहां भी इस अवसर पर खासा हर्षोउल्लास रहता है. भगवान की मूर्तियों का अभिषेक किया जाता है. इसके बाद एक खूबसूरत रथ पर भगवान की मूर्ति को विराजित किया जाता है. इसके बाद जुलूस निकाला जाता है. राजस्थान और गुजरात में तो माहौल देखने लायक होता है क्योंकि देश के इन दो राज्यों में जैन धर्म के लोग सबसे ज्यादा हैं.

Leave a Comment