भगवान कृष्ण के अवतार का प्रतीकवाद, सर्वव्यापी और सर्वज्ञ

भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध में भाग नहीं लिया. इसके बजाय उन्होंने अर्जुन के लिए सारथी बनने का विकल्प चुना.

Leaks: सभी देवताओं में परम और इंसान के बीच रहकर ही उन्हें जीवन के मूल पाठ सिखाएं. वो अपने भक्तों की भूलों को माफ कर देते थे और उन्हें सही पाठ बतलाते थे. कृष्ण के अवतार का प्रतीकवाद अवतार दो संस्कृत शब्दों का संयोजन है - आवा जिसका अर्थ है आगमन और तारा जिसका अर्थ है स्टार. कहा जाता है कि वो चाओस अवधि के दौरान जन्मे थे. उनका जन्म कंस का अंत और बुराईयों को समाप्त करने के लिए हुआ था. कंस, कृष्ण के मामा और उनकी उनकी जैविक मां के भाई थे. जिसकी वजह से जेल में जन्में कृष्ण को यशोदा के पास पालन के लिए भेज दिया गया था. जो कि बेहद सुरक्षात्मक और अनोखे ढंग से उनके पिता के द्वारा किया गया था. जबकि जेल में सात द्वार थे और भारी मात्रा में सैनिक लगे थे. पर उस समय सभी की आंख लग गई और वो उन्हें बाहर अपने मित्र को दे आएं. भगवान कृष्ण के जन्म के समय से ही उनके ऊपर मुसीबतें आने लगीं लेकिन वो भी भी घबराएं नहीं और उन्होंने डटकर सामना किया. भगवान श्रीकृष्ण और राधा की प्रेमकथा सुंदर है जिसमें बाद में दोनों बिछड़ जाते हैं. जिसके बाद राधा का विवाह हो जाता है और वो सदैव मन में भगवान श्रीकृष्ण को बनाएं रहने के बावजूद भी कहीं और रहने लगती हैं. वहीं भगवान श्रीकृष्ण भी गृहस्थ जीवन बसा लेते हैं. लेकिन इनके प्रेम को आत्मा और परमात्मा की तरह माना जाता है जो कि एक दूसरे के बिना अधूरे हैं. भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध में भाग नहीं लिया. इसके बजाय उन्होंने अर्जुन के लिए सारथी बनने का विकल्प चुना. लेकिन बारबाइक ने युद्ध के अंत में कहा, यह सब कृष्ण थे. उन्होंने जहां भी देखा सब लोग उसे कृष्ण के रूप में दिखाई दिये. जो मर गए या जो मारे गए. वो सामने से न आकर उन्होंने सबक सिखाने के लिए हमें ही साधन बनाया और मानवता का पाठ पढ़ाया. उन्होंने हमारे जीवन को सीधे रूप से परिवर्तित नहीं कर सकता, लेकिन वह सर्वव्यापी और सर्वज्ञ हैं. जिन्होंने हर बुराई का अंत कर दिया.

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