भारत के नकदी रहित, होने का वादा जोखिमपूर्ण

दो तिहाई से ज्यादा भारतीयों की पहुंच डिजीटल दुनिया में जीने के लिए जरूरी इंटरनेट तक नहीं है. बैंकिंग डेटा से लैस एक मोबाइल उपकरण की हिफाजत ठीक उसी तरह जरूरी है

नई दिल्ली: भारत अपनी डिजिटल संपत्ति की सुरक्षा के प्रबंधन में कितना समर्थ है और इलेक्ट्रॉनिक वॉलेट और पेमेंट गेटवे का इस्तेमाल करने के दौरान मुझे और आपको क्या करना चाहिए? इन चीजों के लिए कोई सरल उपाय नहीं हैं और सारा बोझ उन यूजर्स पर आ पड़ा है, जिन्होंने अपने धन को कंप्यूटर के कोड सिग्नलों में रखा हुआ है. लगभग बिना प्रशिक्षण के और बिना गहरी समझ के, नागरिकों से इंटरनेट बैंकिंग और मोबाइल एप आधारित वित्तीय लेनदेन को अपनाने के लिए कहा जा रहा है. लोगों को बैंकों के सर्वर से जोड़ने वाले वचरुअल सुपरहाइवे पर पहुंचने के लिए एक ऐसा सर्वव्यापी इंटरनेट चाहिए, जो गड़बड़ी से दूर हो. हालांकि सुदूर इलाकों में यह अभी बहुत दूर की कौड़ी है. भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) के अनुसार, जून 2016 तक इंटरनेट के कुल 35 करोड़ सब्सक्राइबर थे. कई लोगों के पास एक से अधिक मोबाइल फोन और एक से अधिक इंटरनेट कनेक्शन हैं. ऐसे में इसका अर्थ यह है कि दो तिहाई से ज्यादा भारतीयों की पहुंच डिजीटल दुनिया में जीने के लिए जरूरी इंटरनेट तक नहीं है. बैंकिंग डेटा से लैस एक मोबाइल उपकरण की हिफाजत ठीक उसी तरह जरूरी है, जैसे किसी हस्ताक्षरित चेक की होती है. बैंकिंग डेटा से लैस मोबाइल फोन चोरी हो जाना किसी हस्ताक्षरित चेक के चोरी हो जाने जैसा है क्योंकि अधिकतर प्रयोगकर्ता अपने उपकरणों या सिम काडरें को लॉक करने के लिए पिन (पर्सनल आइडेंटिफिकेशन नंबर) का इस्तेमाल नहीं करते. पेटीएम जैसे इलेक्ट्रॉनिक वॉलेट में पैसा भेजना और निकालना बहुत आसान है और इसी वजह से यह लोकप्रिय है. लेकिन वहीं, यदि कोई कार्ड ऐप पर क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड की जानकारी डाल देता है तो चोरी करना भी आसान हो जाता है. इंटरनेट बैंकिंग का ही मामला लीजिए. इसमें 8-16 या ज्यादा अक्षरों का कोड याद रखना पहले ही इंसानों के लिए मुश्किल है.

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