इतिहास खुद को दोहराएगा, 2019 की राह में होगी बीजेपी की परीक्षा

देश के गैर एनडीए दल एकजुट होने की कोशिश करेंगे. उनमें अधिकतर दल जातीय वोट बैंक और समीकरण वाले दल हैं. वे जातीय गठजोड़ बना सकते हैं. मौजूदा स्थिति पर गौर करें तो कुछ प्रदेशों में गैर एनडीए दलों के जातीय गठजोड़ ताकतवर दिखाई पड़ेंगे.

Leaks: साल 2018 में देश की जिन विधानसभाओं के चुनाव होने वाले हैं, उनमें से अधिकतर राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं. जब विपरीत राजनीतिक परिस्थितियों में बीजेपी ने गुजरात पर फतह हासिल कर ली तो वे राज्य तो आसान ही होंगे, ऐसा माना जा रहा है. हां! कर्नाटक में जरूर बीजेपी की परीक्षा होगी. पर असली सवाल 2019 के लोकसभा चुनाव का है. गुजरात-हिमाचल प्रदेश की जीत ने बीजेपी खासकर नरेंद्र मोदी के लिए 2019 की राह आसान कर दी है. उस साल लोकसभा चुनाव होना है. अब नरेंद्र मोदी सरकार निश्चिंत और निर्भीक होकर कुछ ऐसे चौंकाने वाले और बड़े फैसले कर सकती है, जिनसे एनडीए के वोट बढ़ेंगे. और एनडीए संभावित विपक्षी एकजुटता का भी सामना कर पाएगा. वे दूरगामी परिणाम वाले निर्णय हो सकते हैं. विधायिकाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण एनडीए सरकार के एजेंडे में है. दूसरा प्रमुख संभावित निर्णय ओबीसी के मौजूदा आरक्षण को तीन हिस्सों में बांटने से जुड़ा है. ये दोनों फैसले एनडीए के लिए वोट बढ़ाने वाले साबित हो सकते हैं. सरकारी और गैर सरकारी भ्रष्टाचार के मोर्चे पर मोदी सरकार पहले से ही युद्धरत हैं. यह युद्ध मनमोहन सरकार के कथित घोटाला राज से बिलकुल अलग तस्वीर पेश करता है. इस साल के प्रारंभ में उत्तर प्रदेश के बहुसंख्यक मतदाताओं ने नोटबंदी को भ्रष्टाचार विरोधी कदम का ही हिस्सा माना था. इसीलिए नोटबंदी को आपातकाल बताने वाले नेताओं की वहां कुछ नहीं चली. अधिकतर लोग इससे खुश होंगे क्योंकि वे नाजायज तरीके से पैसे कमाने वालों से जलते हैं.
1969 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया. राजा-महाराजाओं के प्रिवी पर्स समाप्त किए तो गरीब लोगों ने खुश होकर 1971 के लोकसभा चुनावों में इंदिरा कांग्रेस को विजयी बना दिया था. क्योंकि पूंजीपतियों और राजाओं पर कार्रवाइयां गरीबों को अच्छी लगीं. जबकि उन फैसलों से गरीबों को तुरंत कोई डायरेक्ट लाभ नहीं मिल रहा था. लगता है कि इतिहास खुद को दोहराएगा. उससे पहले देश के गैर एनडीए दल एकजुट होने की कोशिश करेंगे. उनमें अधिकतर दल जातीय वोट बैंक और समीकरण वाले दल हैं. वे जातीय गठजोड़ बना सकते हैं. मौजूदा स्थिति पर गौर करें तो कुछ प्रदेशों में गैर एनडीए दलों के जातीय गठजोड़ ताकतवर दिखाई पड़ेंगे. यदि इस बीच महिला आरक्षण विधेयक पास हो गया और और ओबीसी आरक्षण को तीन हिस्सों में बांटा जा सका तो वे संभावित जातीय गठबंधन भी असरहीन हो सकते हैं. अधिकतर गैर बीजेपी दलों के असंतुलित धर्म निरपेक्षता वाले रुख के कारण उसका राजनीतिक लाभ हमेशा ही बीजेपी को मिलता रहा है. (संपादन - R Ahir)

Leave a Comment