माता की नौ रूपों की पूजा, कलश की स्थापना का विधान

कलश का आकार-शास्त्रों में कलश के आकार का वर्णन मिलता है। इसे मध्य में 50 अंगुल चैड़ा और 16 अंगुल ऊॅचा व नीचे 12 अंगुल चैड़ा एवं ऊपर से 8 अंगुल का मुख रखें तो यह कलश सर्वश्रेष्ठ माना जाता है.

Leaks: चैत्र नवरात्र रविवार (18 मार्च) से शुरू हो रहा है यानी कल इसका पहला दिन है और इस दिन कलश स्थापना होगी. चैत्र नवरात्र में भी आश्विन में होने वाले नवरात्र की तरह माता दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है और श्रद्धालू उपवास रखते हैं, वे कलश स्थापना भी करते है. कलश को कुम्भ भी कहा जाता है. कुम्भ को समस्त ब्रह्माण्ड का प्रतीक माना जाता है, क्योंकि ब्रह्माण्ड का आकार भी घट के समान है, अतः इसमें समस्त सृष्टि का समावेश माना जाता है. इसी कारणवश किसी भी पूजा व संस्कार में सबसे पहले कलश की स्थापना का विधान है. इसके बिना कोई भी मंगल कार्य सम्पन्न नहीं होता है. कलश स्थापना का अपना एक विधान होता है. इसे पूजन स्थल में ईशान कोण में स्थापित किया जाता है. प्रायः तांबे का कलश ही प्रयोग में लाया जाता है, यदि यह आसानी से उपलब्ध न हो तो मिट्टी, सोने, चादी का कलश भी प्रयोग में लाया जा सकता है.
कलश में प्रयोजनार्थ वस्तुयें रखना-सामान्यतः कलश को जल से भरा जाता है, किन्तु विशेष प्रयोजन में किये जाने वाले अनुष्ठानों में विशेष वस्तुयें रखने का विधान है. कलश को कभी भी भूमि पर नहीं रखना चाहिए. इसको रखने से पूर्व भूमि को शुद्ध करना आवश्यक है, फिर घटार्गल यन्त्र बनाना चाहिए. यदि यह न बना सकें तो बिन्दु, षटकोण, अष्टदल आदि बनाया जा सकता है. इसे बनाने के बाद कोई धान्य रखें उसके बाद उस पर कलश स्थापित करें. कलश के अन्दर उद्देश्य के अनुसार वस्तु को रखें तत्पश्चात देवताओं का आवाहन किया जाता है.

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